युवा कथाकार गीताश्री अपनी कहानियों के द्वारा बहुत ही बेबाकी से उन रास्तों से गुजरती हैं जहाँ स्त्रियों के लिए प्रवेश वर्जित है। इन्हे सिर्फ स्त्री मुक्ति की कहानियाँ कहना इन कहानियों के विस्तृत फ़लक को संकुचित कर देना होगा क्योंकि जहाँ स्त्री विमर्श रुक कर साँसे लेता है और पीछे घूम कर देखता है कि आगे बढ़ने के लिए पुरुषवादी समाज द्वारा बनाये सिद्धांतों और आदर्शों की वैशाखी थाम सके, वहाँ से यह कहानियाँ ज़िंदा होती हैं, साँसे लेती है और स्तब्ध करती हैं अपनी सोच से । गीताश्री की कहानियाँ स्त्री को सिर्फ देह की खोल से नहीं दिमाग से भी आज़ाद करती हैं। उसके लिए रोशनी की वह दुनिया बुनती हैं जहाँ बेधड़क प्रवेश के लिए किसी से अनुमति नहीं लेनी होती और बिना किसी सहारे, बिना किसी जस्टीफ़िकेशन के अपनी आत्मा, अपने औरत होने को सेलिब्रट करतीं हैं ....कभी कभी तो इस हद्द तक कि शुचितावादियों के माथे पर आ जाती है असंख्य शिकनें और स्त्री मुक्ति के नारे तले अपना स्वार्थ साधने वाले भेड़ियों को आ जाता है पसीना ... पढ़िये उनकी ताज़ा-तरीन कहानी “मलाई" । वही मलाई जो हमारे गालों पर तो चुपड़ी गयी ताकि हमारी चिकनी त्वचा उनके इस्तेमाल के लिए तैयार हो सके लेकिन जिसके स्वाद से अक्सर अंजान रहे हम। वही मलाई जो हम ही बिलोते रहे ताकि उनके तन और जीभ पर छाई रहे गुलाबी लेकिन खुद कभी उसे छक कर खा नहीं सके। आज भी 36-24-36 के फिगर के लिए मरी जाती लड़कियां नहीं जानती उसका अपूर्व स्वाद...हमें वंचित रखने के नए तरीके ईज़ाद कर लिए गए हैं बड़ी ही सूक्ष्मता से ... कहानी ऐसे कई सवाल छोड़ जाएगी आपके ज़ेहन में ...पढ़ें और टटोलें अपने अंदर ....आपकी आत्मा पर भी तो नहीं छाई मलाई की परतें .... गिरहों की तरह…
.................................................................................................................................................................सब लोग हैरान, अचानक सुरीलिया को क्या हो गया है। सुरीलिया की ठसक देखते बन रही है। वह घर के बाहर चौकी पर धम्म से बैठ गई। घर के अंदर से उसका सारा संसार बाहर आ चुका था। मां को इंतजार था कि सीधे घर में घुसेगी तो पहली पगार उसके हाथ पर धर देगी जैसे अक्सर कमाऊ पूत किया करते हैं। बेटे अपनी पहली कमाई मां के हाथों में देकर इतने सुकून से भर जाते हैं मानो मातृत्व का मोल चुका दिया हो। सुरीलिया से भी ऐसी ही उम्मीद लगाए मां बाहर टकटकी लगाए बैठी थी। बाबूजी के आने से पहले या उनके सामने ही जब वह पैसे उसकी हथेली पर धरेगी तब कितना आहलाद होगा उसे। पहली संतान की कमाई। आह..कितना सुखद लग रहा है। बेटी है तो क्या हुआ, शादी हो जाएगी तो नहीं लेंगे। वैसे भी कौन-सा हर महीने सुरीलिया देगी हमें। हम तो कहेंगे कि अपनी शादी के लिए पैसे जमा करे। जो जी में आएगा, खरीदेगी। हारी-बीमारी में जमा पैसा ही काम आता है। सारा ऊंच-नीच समझाना होगा उसे। छोटी ही तो है, कपड़े लत्ते में न उड़ा दे पैसे। आज मिठाई लेकर तो जरुर ही आएगी। मुहल्ले में कुछ लोगो के यहां बैना भिजवा देंगे। उधर बेटी के भीतर पल रहे दूधिया, चिकने, अरमानो से बेखबर, इधर सोच सोच कर ही रोमांचित हो रही है सुरीली की मां सरस्वती देवी।
लेकिन यहां नजारा तो दूसरा ही है। सुरीलिया अंदर आई ही नहीं। उसे घर में असली नाम से कोई नहीं पुकारता था। बड़ी हो गई, जवान हो गई, कल से स्कूल में शिक्षामित्र का काम भी मिल गया है। करना धरना कुछ नहीं, 1500 रुपये हर महीने जेब में। मुश्किल से तो कटवारिया थाने के रोबीले सिपाही यानी उसके बाबूजी ने इजाजत दी थी। लड़कीजात का नौकरी करना अभी भी उन्हें गंवारा नहीं। वे मुगलकाल में जी रहे थे। भाई बहनो की भीड़ में शादी के लिए अकेली बची सुरीलिया अब बुनियादी स्कूल में सुरीली सुमन के नाम से जानी जा रही है फिर भी घरवालो ने सुरीलिया कहना नहीं छोड़ा। घरवालो का सुन सुन कर दो छोटे भाई भी दीदी नहीं, सुरीलिया दीदी कह कर ज्यादा आत्मीयता जताते रहते। सुरीली आखिर उनकी तीमारदारी जो करती थी। उन्हें रात को सोने से पहले दूध का गलास भर भर के सुरीली ही देती थी, मोटी मोटी मलाई छलछलाती रहती थी जिसमें।
माई कहती-“तू भी पी ले सुरो..मलाई निकाल देना। खा मत जाना।“
माई का फरमान सुनकर सुरीली के तनबदन में मलाई दौड़ जाती...गीली गीली..मीठी मीठी..मोटी मोटी..चिकनी चिकनी..त्वचा सी मुलायम, रेशमी मलाई। जो अक्सर उसके सपनो में आकर सारे दृश्य मलाईदार कर जाती। सपने नहीं मलाई के छोटे छोटे उल्का पिंड थे, जो रात भर आकाश से टूट टूट कर बरसते थे, उसके होठो पर। दूध से मलाई हटाते हुए उसका दिल मलाई की चिकनाई पर फिसलता रहता। आंखों में मलाई छा जाती और देर तक दूध दिखना बंद हो जाता। पानी मिले दूध को परे रख कर चुपचाप निकल जाती। “हाय रे मलाई..तू दिल से न गई।“ गाढा, छलियाए दूध को देखकर उसका मन कैसा कैसा तो होने लगता। हद तो तब होती जब रोज शाम को बिना नागा बाबूजी पसीने से गंधाती वर्दी दरवाजे पर धरी, युगो युगो से पड़ी, आधी जमीन में धंसी हुई चौकी(तख्त) पर फेंक कर माई को आवाज लगाते।
“अजी सुनती हो...ले जाओ वरदी...सरफ में डालो..रात भर में सूखना चाहिए..अभिए फींच कर पसार दो..अउर रमेसरा भेजा है हमारा सामान कि नहीं...लाओ..दो तो.”
गरमी की शाम में बनियान तक उतार कर फेंक देने वाले, लुंगीधारक पिता चौकी पर महंत जी की तरह जम जाते। उनकी गोरी-गोरी मांसल पीठ पर माई रोज महकता पाउडर लगाती। जैसे पीठ न हो, देव-स्थान हो जिसे गाय के गोबर से लीप रही हों। हौले हौले..माई हाथ चलाती और पिता कटोरा भर मलाई चप चप करके खाते। उस मलाई में किसी को दिलचस्पी नहीं थी सिवाए सुरीली के। कटोरा भर मलाई खाते बाबूजी को देखती तो उसका मन होता उन गोरी मांसल पीठ पर हबक्का लगा दे। अपने नुकीले दांत से काट खाए उन्हें। मलाई का ही नतीजा तो था कि दिन भर धूप में जलने वाले, धूल में लसराने वाले बाबूजी शाम को भी उतने ही चमकते, भक्क भक्क गोरे। माई की संवलाई पर पिता भारी पड़ते थे। शाम को पाउडर की पुताई का भी बड़ा योगदान था। मलाई खाते खाते बाबूजी दिनभर के किस्से पड़ोसी किशोरीलाल जी को सुनाते जिनकी परचून की दूकान मोहल्ले में सबसे ज्यादा पोपुलर थी। किशोरी लाल पान चबाते चबाते तरह के ग्राहको के बारे में अपने अनुभव सुनाते, उनके किस्से कहानियां कभी खत्म न होंतीं। बाबूजी के पास चोर, लंपटो और उठाईगिरो के अलावा अपने हाकिम की भी बहुत कहानियां होतीं।
उस “मलाई-टाइम” में देश की पोलिटिक्स भी बहस का हिस्सा होती पर बाबूजी सत्तारुढ दल की आलोचना से बचते। उनका ध्यान चम्मच से धीरे धीरे खाती हुई मलाई पर ज्यादा जमी रहती। उनका मलाई-प्रेम आसपास सबको पता चल गया था। दरवाजे पर ही बैठ कर खुलेआम खाते थे सो पता कैसे न चलें। मलाई चाहे कैसी भी हो, दूध की हो या बातों की, पहुंचती दूर दूर तक है। काम दूर दूर तक करती है।
अपने काम में बाबूजी मलाई कि चिकनाई का कितना इस्तेमाल कर पाते थे, पता नहीं चल पाया सुरीली को पर वह मलाई दूध से ज्यादा उसके मन पर जम रही थी-मोटी मोटी,..खुरदुरी सतह वाली..। रमेसरा का छोटू बाहर बाहर ही मलाई दे जाता जिसे पाउडर पुतवाते हुए बाबूजी निपटा देते। घर के अंदर मलाई कभी आ ही नहीं पाई। घर के दूध में जो मोटी मलाई पड़ती, जिसे माई छाली कहती थी, उसे घी बनाने के लिए माई निकाल कर रख लेती। छाली रहित दूध या दही सुरीली को कभी भाया नहीं। उसका तो “मन लागो मेरो मलाई में ” की तर्ज पर जीवन कट रहा था।
कई बार माई से सहमते हुए कहा – “मुझे भी मलाई खाना है। बाबूजी खाते हैं, वैसा ही..कटोरी में..मेरे लिए भी मंगवा दो ना।“
माई चौंकी जैसे क्या अनहोनी बात कह दी।
“छाली ?? तुम छाली खाओगी ?? लड़कीजात..छाली खाके कहां जाएगी। देखती नहीं कैसी बेल-सी बढी चली जा रही है.”
“एक बार में कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा माई..? एक बार कटोरा भर खाकर देखना चाहती हूं...तुम कभी खाने नहीं देती..”
“इतना मन है तो दूध से निकाल कर खा लिया कर”
माई थोड़ा पिघली।
“नहीं..घरवाले छाली में वो बात नहीं, वो स्वाद नहीं, रमेसरा हलवाई के यहां से जो आता है..मुझे वह मलाई चाहिए..हल्की जमी हुई..बाबूजी मना करेंगे क्या..पैसे ज्यादा लगते हैं..? ”
उसका मलाई प्रेम प्रकट हुआ और माई की आंखों में कुछ तैरता-सा दिखा। वहां भी मलाई की छाया थी जिसने उनकी आंखों की रौशनी पर असर डाला था। वे चुप लगा गईं। अक्सर बड़बड़ करते रहने वाली माई सिर्फ बाबूजी के सामने ही चुप रहा करती हैं। सुरीली ने महसूस किया कि दोनों के बीच अभियुक्त-जेलर का सा रिश्ता है। माई बाबूजी के बारे में ज्यादा देर सोचना नहीं चाहती थी। दिमाग खराब होने लगता था। उसे तो बस जल्दी बीए पास करके इस कैद से निकल भागना था। इंटरमिडिएट तक किसी तरह लड़झगड़ कर पहुंची थी। बाबूजी तो सब बहनो भाईयो को दसवीं करवा करवा के चलता करते रहे। आखिर पूरी टोली का भार उतारना तो था। तीन बहने जा चुकी थीं, तीन बचे थे। सुरीली और दो छोटे भाई। वह जानती थी कि बेटो के इंतजार में उसकी इंट्री इस दुनिया में हुई। अच्छी बात ये कि बाबूजी कभी सुरीली के सामने उसे बोझ नहीं कहते या समझते थे। बस वे उदासीन से थे सबसे। अपना काम और शाम को गप्प गोष्ठी। माई घर चलाएं, देखें, समझे। बाबूजी को फ्री रखें तमाम घरेलू जिम्मेदारियों से। सुरीली बड़ी हो गई थी सो माई की कुछ दिक्कते कम हो गई थीं। बाबूजी कभी कभार शादी की बात चलाने लगे थे। उसे नहीं करनी थी शादी। उसके सपने में शादी नहीं, खुला मैदान आता था जहां वह अकेली फिरा करती थी, हाथ में चमचाता कटोरा होता और उसमें सफेद सा कुछ जमा हुआ..। सपने से बाहर आकर वह कटोरी में रखी सफेद चीज के स्वाद के बारे में सोचा करती। कभी कभी आधी रात को नींद उचटती तो उसे अपने लड़की होने पर कोफ्त होती। लड़की है तभी तो उसकी जात हमेशा माई याद दिलाती रहती है। बाबूजी उससे दूरी रखते हैं, गर्ल्स कालेज में पढने जाती है, साये की तरह भाई साथ रहता है, कस्बे में सबकी निगाहे उसे घूरती हैं। माई टकटकी लगाए दरवाजे पर उसका इंतजार करती है, हर बात पर टोकती है..”ज्यादा जोर से मत हंस, जोर से मत बोल, सुबह जल्दी उठा कर, दूसरे घर में जाएगी तो क्या करेगी। नाक कटवाएगी क्या हमारा। देख तेरी दोनों बहनें कितने सुख से रह रही हैं। कोई शिकायत नहीं आती उनकी..एक तू है, रत्ती भर भी परवाह नहीं कि लड़कीजात है..”
“लड़कीजात..लड़कीजात..हमारी तो जात ही अलग है। फिर हमें क्यों गिनते हो अपनी बिरादरी में..जाने दो न हमें..”
भीतर से विद्रोह का बुलबुला उठता और फूटता..वह खौलते अदहन की तरह देर तक भपाती रहती। उसके तपते मन को सिर्फ सफेद कटोरी शांत करती। कई बार मन हुआ कि रमेसरा के यहां जाकर खरीद लाए और इसी तरह दरवाजे पर बैठ कर ठाठ से खाए। मौहल्ले की सबसे बड़ी कूटनी शीला दाई जरा देखें आंखें फाड़ फाड़ के...। कह दे जिससे जो कहना हो...
बस एक बार वह बाबूजी हो जाना चाहती थी। खयालो में तो अक्सर बाबूजी की तरह होती। बस अपनी नंगी पीठ की कल्पना नही कर पाती। उसे खुद देख नहीं पाती थी। चाहती तो बहुत थी कि दूर खड़ी होकर अपनी पीठ देखे। पर कैसे ? पीठ पर पाउडर की पुताई...कौन करेगा ? अरे..क्या सोच रही है..? वह लड़कीजात है..नहीं कैसे..? पीठ ही नहीं, अग्रभाग भी खुलेगा ना जिसे ढंकने के लिए तमाम कपड़े इजाद किए गए हैं। कई मोर्चो पर लड़ने वाली सुरीली को अपनी बहनो के अंजाम तक नहीं पहुंचना है। उसे अपनी देह और अपने स्वाद को बराबर रखना है। पर कैसे ?? इसी उधेड़बुन में जिंदगी बीतती जा रही थी। सबका अतीत डार्क होता है, सुरीली को भी अपना भविष्य डार्क नजर आ रहा है। सीधी सपाट पढाई किसी दिशा में कहां ले जाएगी। होमसाइंस, इतिहास और नागरिक शास्त्र। इस कांबीनेशन से करियर की कौन-सी दिशा मिलेगी, उसे क्या पता। उसे इतना मालूम चल गया था कि पढाई ही उसकी मुक्ति का मार्ग है और पढाई से हुई कमाई ही उसका स्वाद बचा कर रख पाएगी।
पहली कमाई ने उसे सबसे पहले रमेसर हलवाई की दूकान पर पहुंचा दिया। स्कूल से लौटते समय थोड़ी देर हो गई थी। उसे अंदेशा था कि बाबूजी घर पहुंच कर दरवाजे पर जम गए होंगे। जमने दो...सुरीली ने सोचने के सारे दिमागी बटन बंद कर दिए।
माई ने भयभीत आंखो से देखा, दोनों अनगढ भाईयों ने फटी फटी आंखों से देखा, बाबूजी ने क्रुध्द दृष्टि से और किशोरीलाल ने विचित्र निगाहो से देखा, साम्राज्ञी की तरह सुरीलिया के हाथ में चमचमाता कटोरा और उसमें बर्फ-सी सफेद कोई चीज जिसे उसी चौकी पर बैठ कर हथेलियो में भर भर कर खा रही है, चाट रही है। उसका स्वाद उसके अंग अंग को पुलकित कर रहा था। वह उस वक्त अपने सपनो से बाहर थी।
आंखों में छायाएं थीं, अनगिन, मां की छवियां, जो अक्सर मलाई के नाम खुरचन उसके मुंह में ठूंस देतीं या थोड़ी सी मलाई होठो तक लाते लाते उसके दोनों गालो पर मल देतीं.
”.खाने से अच्छा गाल पर लगा लें, गोरी हो जाएगी। क्या दिन भर फेयर एंड लवली लगाती रहती है।“
उस वक्त वह तड़प कर रह जाती। मां क्यों नहीं समझती उसके दिल का हाल। एक ही चीज तो धंसी है उसके भीतर। आज मलाई उसके हाथ आई है, पहले तो वह ठिठकी...क्या इसे खा जाए या बेसन हल्दी मिला कर, थोड़ा चेहरे पर भी मल ले...नहीं..उसे गोरपन की क्या जरुरत। वह पहले खाएगी, बाकी बाद में देखेंगे। उसकी आंखों के सामने कड़ाह में कई मन दूध उबल रहे हैं। कुछ कड़ाह में दूध ठंडे हो रहे हैं, उन पर जमने लगी है मोटी मोटी खुरदुरी मलाईयां...। उसकी आखें भी दूधिया रौशनी से भरी थीं।
ठीक उसी वक्त, हल्के अन्हियारे में मोहल्ले की सबसे महान कूटनी शीला दाई उधर से गुजरी, आहलाद से भरी सुरीली ने उसे देखा ही नहीं, देखती तो देख पाती कि सबसे ज्यादा सुख उसकी आंखों में था।
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मां क्यों नहीं समझती उसके दिल का हाल। एक ही चीज तो धंसी है उसके भीतर। आज मलाई उसके हाथ आई है, पहले तो वह ठिठकी...क्या इसे खा जाए या बेसन हल्दी मिला कर, थोड़ा चेहरे पर भी मल ले...नहीं..उसे गोरपन की क्या जरुरत। वह पहले खाएगी, बाकी बाद में देखेंगे। उसकी आंखों के सामने कड़ाह में कई मन दूध उबल रहे हैं। कुछ कड़ाह में दूध ठंडे हो रहे हैं, उन पर जमने लगी है मोटी मोटी खुरदुरी मलाईयां...। उसकी आखें भी दूधिया रौशनी से भरी थीं। - See more at: http://www.merakipatrika.com/2015/01/geet-shree-malai.html#sthash.NtVOY6DM.dpuf
ठीक उसी वक्त, हल्के अन्हियारे में मोहल्ले की सबसे महान कूटनी शीला दाई उधर से गुजरी, आहलाद से भरी सुरीली ने उसे देखा ही नहीं, देखती तो देख पाती कि सबसे ज्यादा सुख उसकी आंखों में था।
एक ऐसा सत्य जिसे स्त्री ही समझ सकती है ........दोगली सोच की पराकाष्ठा है ये कहानी जहाँ पितृ सत्तात्मक समाज परिलक्षित होता है तो दूसरी तरफ लिंगभेद से उपजी कुंठा और उसे तोड़ने के लिए सुरीली द्वारा की गयी पहल बेशक आश्चर्य के कितने पहाड़ खड़े कर दे मगर बदलाव के लिए जरूरी है स्त्री खुद आगे बढे , खुद पहल करे न कि किसी मसीहा का इंतज़ार करे ...........बचपन से बैठी कुंठा को तोड़ने का मुंहतोड़ जवाब है कहानी मलाई ..........शिक्षा ही वो माध्यम है जो सब बंद दरवाज़ों को खोलती है और एक नया सुनहरा भविष्य प्रदान करती है ..........एक कहानी विभिन्न आयामों को समेटे प्रेरक सन्देश देती है ........बधाई गीता जी
Geeta Shree हमारे समय की महत्त्वपूर्ण लेखिका हैं। उनकी नवीनतम कहानी 'मलाई' एक लड़की की मलाई खाने के प्रति आसक्ति, गोरी होने की लालसा के अन्तर्संघर्ष के बीच झूलते हुए स्त्री विमर्श के कुछ नुकीले सवालों से सामना कराती है। इस कहानी में माँ- पिता और भाई का सुरीली के प्रति अतिशय संरक्षणवादी रवैया मध्यमवर्गीय परिवारों की हक़ीक़त है। भाई और पिता को मलाईदार दूध लेते देखना और खुद को इससे वंचित पाना एक बेहद सामान्य सी दिखने वाली पारिवारिक घटना है जिसे गीताश्री उसकी पूरी बुर्जुआवादी छवि के साथ वे कहानी में पेश कर देती हैं। फेयर एण्ड लवली बनाम मलाई के द्वंद्व में फंसकर सुरिलिया मलाई को चेहरे पर गोरी होने हेतु लगाने से बेहतर अपनी चिरदमित यूटोपियाई चाह कटोरी भर मलाई खाने से पूरी करती है। यह एक लड़की का घर की चौखट पर बैठकर पेट भर मलाई खाना नहीं है अपितु इसके बहाने लेखिका पुरुष वर्चस्व के हथियारों पर अपने तरीके से चोट करती है। यहाँ तक कि नायिका की माँ भी इस दिग्विजयी कार्य में कहीं न कहीं अपनी जीत का भी अनुभव करती है। ऐसे में मलाई सिर्फ दूध की मोटी परत भर न रहकर स्त्री मुक्ति का पुरुष मानसिकता के विरुद्ध पैना औज़ार बन जाती है।
आज के समय की एक बेहद महत्त्वपूर्ण कहानी है मलाई जिसके पाठ विखण्डन की गांठों को खोले जाने की ज़रूरत है।
सुरीली ने महसूस किया कि दोनों के बीच अभियुक्त-जेलर का सा रिश्ता है। माई बाबूजी के बारे में ज्यादा देर सोचना नहीं चाहती थी......ये प्रसंग पुरुष प्रधान समाज को इंगित करता है..पति पत्नी मे समान रूप का सामंजस्य न हो तो बच्चे भी उनके रिश्ते के प्रति उदासीन हो जाते है..प्रत्येक पंक्ति अपने आप मे बहुत कुछ संजोये हुए है....अति सुंदर... बहुत बहुत बधाई गीताजी
एक मध्यवर्गीय लड़की की कहानी अनगिनत लड़कियों की सच्ची कहानी है।सचमुच आर्थिक आत्म निर्भरता स्त्री स्वतंत्रता का प्रवेश द्वार कहा जा सकता है।शायद यही कारण है कि सर्विसवाली लड़की की शादी भी कम मुश्किल से हो जाती है।लड़कों को लड़की के सारे ऐब छुप जाते हैं, पैसे के लिए। आत्म निर्भर लड़की अपनी मर्जी के सारे काम कर सकती है, अगर हौसला हो।विरोध करने वाले लोगों का भी मुंह बंद हो जाता है।।
एक लड़की का आत्मनिर्भर होना कितना जरूरी है एक मध्यवर्गीय परिवार की लडकी के लिए तो और भी कितनी इच्छाएँ होती है उसकी अपनी जो दूसरों के ऊपर निर्भर कर जाती है और त्याग देती है अपनी खुशी अपना होना नही समझते सभी उसकी कल्पनाओं को और जरूरतों को , बहुत सही और सुन्दर कहानी दी
एक लड़की का आत्मनिर्भर होना कितना जरूरी है एक मध्यवर्गीय परिवार की लडकी के लिए तो और भी कितनी इच्छाएँ होती है उसकी अपनी जो दूसरों के ऊपर निर्भर कर जाती है और त्याग देती है अपनी खुशी अपना होना नही समझते सभी उसकी कल्पनाओं को और जरूरतों को , बहुत सही और सुन्दर कहानी दी
आज सुबह गीताश्री की छोटी सी कहानी "मलाई" पढ़ी … और तब से वह एक शूल की तरह मेरे मन में अटकी हुई है। जवान होती लड़की सुरीली सुमन के जीवन में प्रेम और भविष्य को लेकर उठने वाली उत्ताल तरंगों को जिस अतिरेकी चाहत ने अपने सामने बौना बना दिया वह है एक कटोरा मलाई खा लेने की ख़्वाहिश -- और वह भी घर के किसी कोने में छुप कर नहीं बल्कि पिता की तरह घर के बाहर रखी चौकी पर बैठ कर जिस से सारी दुनिया इस विद्रोह को देख सके। उसका अधैर्य देखिये कि नौकरी की पहली पगार से वह अपने अरमान पूरे कर लेती है -- अभी माँ बाबूजी का शासन था जिसमें मोटी मोटी मलाई छलछलाते दूध के ग्लास पर भाइयों और सिर्फ़ भाइयों का हक़ था … अपनी गृहस्थी सँभालने के बाद भी कौन जाने पति और बेटों के सामने उसके मलाई के सपने फलीभूत हों कि न हों। मलाई की इच्छा कई बार पिता की मलाई खा खा कर बनी गोरी मांसल पीठ पर हबक्का लगा देने की हद तक हिंसक भी हो जाती है -- घर की छाली और हलवाई के यहाँ से आयी मलाई के बीच भला क्या मुकाबला .... कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली ?
"उसके सपने में शादी नहीं खुला मैदान आता था जहाँ वह अकेली फिरा करती थी ,हाथ में चमचमाता कटोरा होता और उसमें सफ़ेद सा कुछ जमा हुआ …"
मलाई का रूपक गीताश्री जी ने जिस तबियत और दक्षता के साथ गढ़ा है और उसकी इतनी सारी बारीक तहें और परतें हैं कि भारत के मध्यवर्गी विमर्श ( मैं इसको स्त्री विमर्श के कम्पार्टमेंट में नहीं बाँधना चाहता ) का व्यापक फलक हमारे सामने खुल जाता है। पता नहीं कितना प्रासंगिक है पर मैं यह कहने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ कि "मलाई"पढ़ते हुए मुझे रघुवीर सहाय की कहानी "सेब" और सुभद्रा कुमारी चौहान की "कदम्ब के फूल" याद आती रही पर यथास्थिति के प्रति अस्वीकार और आक्रोश को नापाम बम की माफ़िक फूट पड़ने की हद तक ले आने का बीड़ा गीताश्री ने उठाया है।
भावुक होकर समीक्षा करना बड़ा आसान है----- वास्तव में तो यह अप्राकृतिक भाव जैसा लगता है ---- कोइ भी कैसी भी लड़की पढ़ लिख कर इस प्रकार का व्यवहार नहीं करेगी ----